ये घटना सुन कर मै रो पडा !!
एक सत्य घटना, जो सभी की आँखे खोल देगी, :::--
ये दो व्यक्तियों के बीच की बातचीत के सम्बन्ध में है,
एक ट्रेन में दो व्यक्ति यात्रा कर रहे थे, एक व्यक्ति, जिसका नाम, विवेक प्रधान था, वह बहुत उदास सा बैठा था यात्रा कर रहा था, दोनों शताब्दी में बैठे थे, शताब्दी ट्रेन की ठंढक भी उसको सामान्य बनाये रखने में असमर्थ थी. वह एक IT कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर थे, और अभी भी वह, हवाई जहाज में यात्रा करने के अधिकारी नहीं थे कंपनी की ओर से, अतः वह अपसेट ही रहा करते थे, कंपनी को गाली ही दिया करते थे.
उसने कई बार अपने HR को कहा भी किन्तु , कंपनी की पालिसी के कारन HR भी मजबूर था.
उसने उसी उलझन में अपना बैग खोला, और अपना लैपटॉप निकल कर काम करने लगा. कुछ टाइम पास के लिए भी, क्यों की समय नहीं काटे कट रहा था.
“ क्या आप, सॉफ्टवेर इंडस्ट्री में है सर, ?” बगल में बैठे सहयात्री ने, समय बिताने के लिए विवेक से, जो बड़े रुआब से लैपटॉप पर ध्यान से काम कर रहा था, पूछा. विवेक, भुनभुनाते हुए, सिर्फ हामी भर दी. अनिक्षा से, एक सरसरी नजर डालते हुए, और अपने लैपटॉप की ओर, और भी ध्यान देते हुए उसकी IMPORTANCE को जताते हुए, जैसे कि वह लैपटॉप, एक बहुत ही बेशकीमती वस्तु हो.
सहयात्री “ सर , आप लोगों ने अब काम को बहुत ही सरल कर दिया है, कंप्यूटर की उच्च तकनीक ने सभी का काम बहुत आसान कर दिया है. आज हर चीज़ कंप्यूटर से सरलता से की जा सकती है .”
विवेक ने उसकी ओर अनिक्षा से देखते हुए कहा. .. थैंक्स, ... वास्तव में विवेक अपने काम से इतना दुखी था, कि, वह अपने काम की बड़ाई भी, उसको गाली जैसी लगती थी.
सहयात्री, एक मजबूत कदकाठी का था, और देखने में एक खिलाड़ी जैसा लग रहा था, युवा था. वह सरल व्यक्तित्व वाला, एक छोटे से गाँव या कसबे का रहने वाला सरल युवा था. विवेक को, वह रेलवे के स्पोर्ट्स कोटे का आदमी सा लग रहा था, जिसे, फ्री में यात्रा करने की अनुमति होती है.
सहयात्री ने फिर बात आगे बढाई, आप लोगों की ड्यूटी कितनी आराम दायक होती है, ऑफिस में बैठ कर, पीसी पर काम करना और उसके द्वारा बाहर कितने बड़े बड़े काम होते रहते है .!!!
अपनी नौकरी से पहले ही दुखी, विवेक ने छोटी मुस्कान छोड़ी, क्यों कि, सहयात्री की सहजता, और सरलता, विवेक के अंतर का फ्रस्टेशन होने के बावजूद, उसको क्रोध करने से रोक रही थी,
विवेक ने कहा ::- ये बात नहीं, है, कि ऑफिस में बैठ कर कुछ लाइन्स लिख दें, और, काम होने लगें, इस काम में इतने झंझट है, कि आदमी परेशान हो जाता है, उस स्टेज तक पहुँचने के लिए, बड़े पापड़ बेलने पड़ते है, .... वह सोचने लगा, कि S/W की दुनिया की परेशानियों को बता ही दिया जाए ... बोला..... ये बहुत ही उलझन वाला है, बहुत ही, ......
सहयात्री :: जरूर होगा, होना ही चाहिए..... आप लोगों को इतनी बड़ी बड़ी तनखाहें दी जाती है, यूं ही नहीं .....
विवेक, अब और भी उत्तेजित हो गया, तल्खी से बोला, :::-हाँ, सब, ज्यादा पैसा ही देखते है, लेकिन..... लेकिन जिस मगजमारी से हमलोगों को गुजरना पड़ता है, उसको कोई नहीं देखता. ... समझने की कोशिश भी नहीं करता.
भारत में, तो लोग उल्टा ही सोचते है, सिर्फ इसलिए कि......... हम A.C. में बैठ कर काम करते है, ........इसका मतलब ये नहीं कि हमें पसीना आता ही नहीं ...
आप अपनी बॉडी बनाये रखने के लिए कसरत करते है, और हम लोग,, दिमाग की कसरत करते रहते है.
विवेक ने सोचा इसको और भी कायदे से समझा दिया जाए और उसकी “ औकात “ बता दिया जाए ....
उसने कहा, देखो आप जिस ट्रेन में सफ़र कर रहे है, उसकी सभी टिकते कम्प्यूटर से बुक होती है, डाटा, इधर से उधर होता है, पूरे देश में करोड़ों टिकते रोज़ बिकती है, कैंसिल होती है, Thousands of transactions accessing a single database, at a time concurrently; data integrity, locking, data security. इन सब कामो को करने में कितना दिमाग ख़राब होता है, इसका अंदाजा है आपको.........???
एक घ्रनणात्मक भाषा पर उतर आया था, विवेक...
सहयात्री, एक छोटे से बच्चे की भांति, जो किसी मछलीघर में किसी अद्भुद मछली को, जैसे देख रहा हो, ,
इस उत्कंठा, में पूछा : तो क्या आप, उन सबका कोड बनाते है ?
“ हाँ, मै पहले बनाता था, लेकिन अब मै प्रोजेक्ट मेनेजर हूँ, ये सब काम छोटे लोग करते है.”
“ ओह !! सर, इसका मतलब अब आपका काम सरल हो गया.......... “
इस बात से विवेक और भी भड़क गया .. बोला::-- क्या बात करते हो, काम सरल कहाँ से हो गया,?
बड़ी पोस्ट, मतलब बड़ी जिम्मेदारी, डिजाईन और कोडिंग तो सरल काम है, मगर अभी का काम ज्यादा stress वाला है, मेरा काम है समय पर लोगों से काम लेना और आगे,
पेर्फेक्ट्ली क्लाइंट्स को बढ़ा देना, काम क्वालिटी का ही होना चाहिए, वरना कोई हमसे क्यों काम करवाएगा ?...
यही नहीं, क्लाइंट, जो हमेशा, एक नई जरूरत के साथ हर समय फोन पर ही रहता है, उसकी हर जरूरत का ध्यान रखना , और उसी प्रकार के S/W को बनाना हलुवा है क्या ? ? ? ? ? ? ? ? “
विवेक, ये कह के रुक गया, सोचने लगा, इससे क्या बात करें,,, ये तो गाँव का "पहलवान" है,
क्या समझेगा ये ...?? ..........
.मगर अपने मन के भड़ास तो निकाल ही दी थी उसने~~~~.
उसने बात को ख़त्म करते हुए कहा ::-
देखो, तुम समझ ही नहीं सकते, कि हमारे काम, में
क्या क्या “लाइन ऑफ़ फायर” होती है, कहाँ काम अटक जाए, कोई कह ही नहीं सकता. उसकी भाषा में स्पष्ट रूप से नफरत और घ्रणा झलक रही थी.
कुछ शांति के बाद, सहयात्री ने बोलना चाहा:
:जी, मुझे मालूम है “लाइन ऑफ़ फायर” क्या होती है !!
“सर.....!!!. और, ...........
वह शून्य में देखने लगा............ ऐसे---- जैसे ...... कि ना तो वहां कोई ट्रेन हो, और ना ही कोई यात्री हो ......उसने आगे कहना शुरू किया :: ......
हम 30 लोग थे, और हमको आदेश दिया गया था, कि किसी भी हालात में, पॉइंट ४८७५ पर कब्जा करना है, .....
.......और, वह भी रात्रि में,. किसी को कुछ भी हो सकता था,
कहीं से पकिस्तान की गोली किस्सी को भी लग सकती थी, ..... बस हम बढ़ते ही चले गए, और जब कारगिल की चोटी पर, हमने अपना तिरंगा फहराया,
तो हम ३० में से सिर्फ ४ जीवित बचे थे ..............
वह फिर से शून्य में खोने लगा......
अब विवेक की चौंकने की बारी थे, ......
“तो क्या आप ............?/??”
“ जी, मै सूबेदार शुशान्त , १३ J&K Rifles on duty at Peak 4875 in Kargil .......
उन्होंने( बोस्सेस ने ) मुझे बोला, कि मैंने, अपनी सेना का टर्म पूरा कर लिया है, अब मै
किसी सॉफ्ट जॉब में जा सकता हूँ...........
लेकिन सर , क्या आप बताएँगे, क्या कोई अपनी लाइफ को सरल बनाने के लिए, अपने कर्तव्य से दूर जा सकता है ????
उस कारगिल अभियान में , मेरा एक साथी, ..बर्फ में घायल पडा था, जहां दुश्मन की गोलिया लगातार चल रही थीं. ....और हम एक बंकर में पीछे छिपे थे .... और एक अच्छे सैनिक के रूप में, मेरा फर्ज था कि, मै अपने उस घायल साथी को वहां से निकाल कर, सुरक्षित स्थान पर पहुँचाऊँ .... . लेकिन मेरे कप्तान ने मुझे रोका और, स्वयं आगे बढ़ गए..... उन्होंने कहा, कि हमारा पहला फर्ज है, कि एक व्यक्ती की रक्षा करने से ज्यादा, देश की रक्षा करना.... उसकी खुद की, अपनी रक्षा की परवाह किये बगैर ......
“”” .......और वह मारे गए, दुश्मन की गोली लग गयी उनको... लेकिन वह, उस घायल साथी को खींच का, बंकर में सुरक्षित ले आये थे.
उसके बाद, हम लोग उस बुलेट को रोज़ ही देखते थे, जिसको मेरे शरीर में जाना था, मगर वह हमारे कप्तान के शरीर में गयी.... . इसलिए सर !! मुझे मालूम है की......... I know sir....I know, what it is to be in the “ Line of Fire.”
विवेक , फटी फटी आँखों से उसको देख रहा था, ये नहीं सोच पा रहा था, कि किस प्रकार उसकी बातो को रेस्पोंड करे... किंकर्तव्य विमूढ़ हो गया था....
उसने अपने लैपटॉप को बिना कुछ सोचे, बंद कर दिया. वह खुद को बहुत छोटा महसूस कर रहा था. एक रेंगने वाला कीड़ा !!!
उस व्यक्ति को ध्यान से देख रहा था, जिसने जीवन में बहादुरी और देश के लिए, जान से खेल जाने के अतिरिक्त, कुछ अन्य बात जानी ही नहीं थी, जिनके बारे में, सिर्फ अभी तक अखबारों में ही पढ़ा था.
ट्रेन धीमी हो गयी थी, सूबेदार शुषान्त ने अपना बैग उठाया, उतरने के लिए, और विवेक से हाथ मिलाया, “ आपसे मिल कर बहुत ख़ुशी हुई .....” कहा.
विवेक के हाथ काँप रहे थे, उससे हाथ मिलाते हुए.... ये हाथ, बर्फीले पहाड़ों पर, दुश्मन की गोलियों से बचते बचाते देश की रक्षा करते हुए, और कारगिल की चोटी पर चढ़े है, और इन हाथों ने कारगिल की चोटी पर, अपने तिरंगे को पहराया है, .... वह अचानक खडा हो गया, सावधान की मुद्रा में, औ जोरदार सोल्युट दिया... इस जवांन को ...... कम से कम वह अपने देश के लिए इतना तो कर ही सकता था.......
PS :-- इस घटना को ट्रू –लाइफ घटना के रूप में बताया गया था. और जो अधिकारी की म्रत्यु हुई थी उनका नाम था कप्तान बत्रा.... जिन्हें बाद में उनकी बहदुरी के लिए परम वीर चक्र परदान किया गया था.
इसलिए भाईयो , जब भी आप यात्रा करें हमेशा नम्र रहें, पता नहीं आपके सहयात्री का कद कितना ऊंचा हो !!!!!!!
जय हिन्द !!
( इसका अंग्रेज़ी वर्णन, मैंने ३ दिन पूर्व फेसबुक में पोस्ट किया था, उसको मात्र २ लोगों ने like किया था, मुझे बहुत दुःख हुआ. मैंने समझ लिया कि इतने बड़े लेख को , आलस्य के कारण यादातर मित्त्रों ने अवॉयड किया है, अतः, आज सुबह ,मैंने, उसका हिंदी में अनुवाद किया, आशा है, की कुछ मित्र इसको पढेंगे .)
एक सत्य घटना, जो सभी की आँखे खोल देगी, :::--
ये दो व्यक्तियों के बीच की बातचीत के सम्बन्ध में है,
एक ट्रेन में दो व्यक्ति यात्रा कर रहे थे, एक व्यक्ति, जिसका नाम, विवेक प्रधान था, वह बहुत उदास सा बैठा था यात्रा कर रहा था, दोनों शताब्दी में बैठे थे, शताब्दी ट्रेन की ठंढक भी उसको सामान्य बनाये रखने में असमर्थ थी. वह एक IT कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर थे, और अभी भी वह, हवाई जहाज में यात्रा करने के अधिकारी नहीं थे कंपनी की ओर से, अतः वह अपसेट ही रहा करते थे, कंपनी को गाली ही दिया करते थे.
उसने कई बार अपने HR को कहा भी किन्तु , कंपनी की पालिसी के कारन HR भी मजबूर था.
उसने उसी उलझन में अपना बैग खोला, और अपना लैपटॉप निकल कर काम करने लगा. कुछ टाइम पास के लिए भी, क्यों की समय नहीं काटे कट रहा था.
“ क्या आप, सॉफ्टवेर इंडस्ट्री में है सर, ?” बगल में बैठे सहयात्री ने, समय बिताने के लिए विवेक से, जो बड़े रुआब से लैपटॉप पर ध्यान से काम कर रहा था, पूछा. विवेक, भुनभुनाते हुए, सिर्फ हामी भर दी. अनिक्षा से, एक सरसरी नजर डालते हुए, और अपने लैपटॉप की ओर, और भी ध्यान देते हुए उसकी IMPORTANCE को जताते हुए, जैसे कि वह लैपटॉप, एक बहुत ही बेशकीमती वस्तु हो.
सहयात्री “ सर , आप लोगों ने अब काम को बहुत ही सरल कर दिया है, कंप्यूटर की उच्च तकनीक ने सभी का काम बहुत आसान कर दिया है. आज हर चीज़ कंप्यूटर से सरलता से की जा सकती है .”
विवेक ने उसकी ओर अनिक्षा से देखते हुए कहा. .. थैंक्स, ... वास्तव में विवेक अपने काम से इतना दुखी था, कि, वह अपने काम की बड़ाई भी, उसको गाली जैसी लगती थी.
सहयात्री, एक मजबूत कदकाठी का था, और देखने में एक खिलाड़ी जैसा लग रहा था, युवा था. वह सरल व्यक्तित्व वाला, एक छोटे से गाँव या कसबे का रहने वाला सरल युवा था. विवेक को, वह रेलवे के स्पोर्ट्स कोटे का आदमी सा लग रहा था, जिसे, फ्री में यात्रा करने की अनुमति होती है.
सहयात्री ने फिर बात आगे बढाई, आप लोगों की ड्यूटी कितनी आराम दायक होती है, ऑफिस में बैठ कर, पीसी पर काम करना और उसके द्वारा बाहर कितने बड़े बड़े काम होते रहते है .!!!
अपनी नौकरी से पहले ही दुखी, विवेक ने छोटी मुस्कान छोड़ी, क्यों कि, सहयात्री की सहजता, और सरलता, विवेक के अंतर का फ्रस्टेशन होने के बावजूद, उसको क्रोध करने से रोक रही थी,
विवेक ने कहा ::- ये बात नहीं, है, कि ऑफिस में बैठ कर कुछ लाइन्स लिख दें, और, काम होने लगें, इस काम में इतने झंझट है, कि आदमी परेशान हो जाता है, उस स्टेज तक पहुँचने के लिए, बड़े पापड़ बेलने पड़ते है, .... वह सोचने लगा, कि S/W की दुनिया की परेशानियों को बता ही दिया जाए ... बोला..... ये बहुत ही उलझन वाला है, बहुत ही, ......
सहयात्री :: जरूर होगा, होना ही चाहिए..... आप लोगों को इतनी बड़ी बड़ी तनखाहें दी जाती है, यूं ही नहीं .....
विवेक, अब और भी उत्तेजित हो गया, तल्खी से बोला, :::-हाँ, सब, ज्यादा पैसा ही देखते है, लेकिन..... लेकिन जिस मगजमारी से हमलोगों को गुजरना पड़ता है, उसको कोई नहीं देखता. ... समझने की कोशिश भी नहीं करता.
भारत में, तो लोग उल्टा ही सोचते है, सिर्फ इसलिए कि......... हम A.C. में बैठ कर काम करते है, ........इसका मतलब ये नहीं कि हमें पसीना आता ही नहीं ...
आप अपनी बॉडी बनाये रखने के लिए कसरत करते है, और हम लोग,, दिमाग की कसरत करते रहते है.
विवेक ने सोचा इसको और भी कायदे से समझा दिया जाए और उसकी “ औकात “ बता दिया जाए ....
उसने कहा, देखो आप जिस ट्रेन में सफ़र कर रहे है, उसकी सभी टिकते कम्प्यूटर से बुक होती है, डाटा, इधर से उधर होता है, पूरे देश में करोड़ों टिकते रोज़ बिकती है, कैंसिल होती है, Thousands of transactions accessing a single database, at a time concurrently; data integrity, locking, data security. इन सब कामो को करने में कितना दिमाग ख़राब होता है, इसका अंदाजा है आपको.........???
एक घ्रनणात्मक भाषा पर उतर आया था, विवेक...
सहयात्री, एक छोटे से बच्चे की भांति, जो किसी मछलीघर में किसी अद्भुद मछली को, जैसे देख रहा हो, ,
इस उत्कंठा, में पूछा : तो क्या आप, उन सबका कोड बनाते है ?
“ हाँ, मै पहले बनाता था, लेकिन अब मै प्रोजेक्ट मेनेजर हूँ, ये सब काम छोटे लोग करते है.”
“ ओह !! सर, इसका मतलब अब आपका काम सरल हो गया.......... “
इस बात से विवेक और भी भड़क गया .. बोला::-- क्या बात करते हो, काम सरल कहाँ से हो गया,?
बड़ी पोस्ट, मतलब बड़ी जिम्मेदारी, डिजाईन और कोडिंग तो सरल काम है, मगर अभी का काम ज्यादा stress वाला है, मेरा काम है समय पर लोगों से काम लेना और आगे,
पेर्फेक्ट्ली क्लाइंट्स को बढ़ा देना, काम क्वालिटी का ही होना चाहिए, वरना कोई हमसे क्यों काम करवाएगा ?...
यही नहीं, क्लाइंट, जो हमेशा, एक नई जरूरत के साथ हर समय फोन पर ही रहता है, उसकी हर जरूरत का ध्यान रखना , और उसी प्रकार के S/W को बनाना हलुवा है क्या ? ? ? ? ? ? ? ? “
विवेक, ये कह के रुक गया, सोचने लगा, इससे क्या बात करें,,, ये तो गाँव का "पहलवान" है,
क्या समझेगा ये ...?? ..........
.मगर अपने मन के भड़ास तो निकाल ही दी थी उसने~~~~.
उसने बात को ख़त्म करते हुए कहा ::-
देखो, तुम समझ ही नहीं सकते, कि हमारे काम, में
क्या क्या “लाइन ऑफ़ फायर” होती है, कहाँ काम अटक जाए, कोई कह ही नहीं सकता. उसकी भाषा में स्पष्ट रूप से नफरत और घ्रणा झलक रही थी.
कुछ शांति के बाद, सहयात्री ने बोलना चाहा:
:जी, मुझे मालूम है “लाइन ऑफ़ फायर” क्या होती है !!
“सर.....!!!. और, ...........
वह शून्य में देखने लगा............ ऐसे---- जैसे ...... कि ना तो वहां कोई ट्रेन हो, और ना ही कोई यात्री हो ......उसने आगे कहना शुरू किया :: ......
हम 30 लोग थे, और हमको आदेश दिया गया था, कि किसी भी हालात में, पॉइंट ४८७५ पर कब्जा करना है, .....
.......और, वह भी रात्रि में,. किसी को कुछ भी हो सकता था,
कहीं से पकिस्तान की गोली किस्सी को भी लग सकती थी, ..... बस हम बढ़ते ही चले गए, और जब कारगिल की चोटी पर, हमने अपना तिरंगा फहराया,
तो हम ३० में से सिर्फ ४ जीवित बचे थे ..............
वह फिर से शून्य में खोने लगा......
अब विवेक की चौंकने की बारी थे, ......
“तो क्या आप ............?/??”
“ जी, मै सूबेदार शुशान्त , १३ J&K Rifles on duty at Peak 4875 in Kargil .......
उन्होंने( बोस्सेस ने ) मुझे बोला, कि मैंने, अपनी सेना का टर्म पूरा कर लिया है, अब मै
किसी सॉफ्ट जॉब में जा सकता हूँ...........
लेकिन सर , क्या आप बताएँगे, क्या कोई अपनी लाइफ को सरल बनाने के लिए, अपने कर्तव्य से दूर जा सकता है ????
उस कारगिल अभियान में , मेरा एक साथी, ..बर्फ में घायल पडा था, जहां दुश्मन की गोलिया लगातार चल रही थीं. ....और हम एक बंकर में पीछे छिपे थे .... और एक अच्छे सैनिक के रूप में, मेरा फर्ज था कि, मै अपने उस घायल साथी को वहां से निकाल कर, सुरक्षित स्थान पर पहुँचाऊँ .... . लेकिन मेरे कप्तान ने मुझे रोका और, स्वयं आगे बढ़ गए..... उन्होंने कहा, कि हमारा पहला फर्ज है, कि एक व्यक्ती की रक्षा करने से ज्यादा, देश की रक्षा करना.... उसकी खुद की, अपनी रक्षा की परवाह किये बगैर ......
“”” .......और वह मारे गए, दुश्मन की गोली लग गयी उनको... लेकिन वह, उस घायल साथी को खींच का, बंकर में सुरक्षित ले आये थे.
उसके बाद, हम लोग उस बुलेट को रोज़ ही देखते थे, जिसको मेरे शरीर में जाना था, मगर वह हमारे कप्तान के शरीर में गयी.... . इसलिए सर !! मुझे मालूम है की......... I know sir....I know, what it is to be in the “ Line of Fire.”
विवेक , फटी फटी आँखों से उसको देख रहा था, ये नहीं सोच पा रहा था, कि किस प्रकार उसकी बातो को रेस्पोंड करे... किंकर्तव्य विमूढ़ हो गया था....
उसने अपने लैपटॉप को बिना कुछ सोचे, बंद कर दिया. वह खुद को बहुत छोटा महसूस कर रहा था. एक रेंगने वाला कीड़ा !!!
उस व्यक्ति को ध्यान से देख रहा था, जिसने जीवन में बहादुरी और देश के लिए, जान से खेल जाने के अतिरिक्त, कुछ अन्य बात जानी ही नहीं थी, जिनके बारे में, सिर्फ अभी तक अखबारों में ही पढ़ा था.
ट्रेन धीमी हो गयी थी, सूबेदार शुषान्त ने अपना बैग उठाया, उतरने के लिए, और विवेक से हाथ मिलाया, “ आपसे मिल कर बहुत ख़ुशी हुई .....” कहा.
विवेक के हाथ काँप रहे थे, उससे हाथ मिलाते हुए.... ये हाथ, बर्फीले पहाड़ों पर, दुश्मन की गोलियों से बचते बचाते देश की रक्षा करते हुए, और कारगिल की चोटी पर चढ़े है, और इन हाथों ने कारगिल की चोटी पर, अपने तिरंगे को पहराया है, .... वह अचानक खडा हो गया, सावधान की मुद्रा में, औ जोरदार सोल्युट दिया... इस जवांन को ...... कम से कम वह अपने देश के लिए इतना तो कर ही सकता था.......
PS :-- इस घटना को ट्रू –लाइफ घटना के रूप में बताया गया था. और जो अधिकारी की म्रत्यु हुई थी उनका नाम था कप्तान बत्रा.... जिन्हें बाद में उनकी बहदुरी के लिए परम वीर चक्र परदान किया गया था.
इसलिए भाईयो , जब भी आप यात्रा करें हमेशा नम्र रहें, पता नहीं आपके सहयात्री का कद कितना ऊंचा हो !!!!!!!
जय हिन्द !!
( इसका अंग्रेज़ी वर्णन, मैंने ३ दिन पूर्व फेसबुक में पोस्ट किया था, उसको मात्र २ लोगों ने like किया था, मुझे बहुत दुःख हुआ. मैंने समझ लिया कि इतने बड़े लेख को , आलस्य के कारण यादातर मित्त्रों ने अवॉयड किया है, अतः, आज सुबह ,मैंने, उसका हिंदी में अनुवाद किया, आशा है, की कुछ मित्र इसको पढेंगे .)