मै वही हूँ :--
श्वेत श्रंगों वाला,
वक्ष को चीर कर ,
फूट पड़ती , -
असंख्य अमृत ~~
जल धाराएँ.,
मै विस्तृत रेत हूँ,
गोद की परतें खोल कर ,
गहरे अतल में,
सिमटकर उभर आती हैं,
अंजलि भर~~
अमृत की बूँदें .
मैं महाजल राशि हूं,
जलधि ही, थक कर तुम कहीं,
लौट मत जाना !
तुम्हारे लिए ही बंध गया हूँ,
मौन उन्नत पर्वतों से,
अलस, उज्जवल रेत से,
विरूप शिलाखंडों से .
लो अभ्रभेदी लहर~~~
तुम तक आ गयी-----
मै वही हूँ बूँद,
जो पर्वतों का वक्ष चीरती है,
जो रेत में सोयी पडी है,
या,
जलधि के वक्ष पर,
हीरक हार बनती है ,
बस, वही हूँ मैं--
नहीं हूँ मै पर्वत !,
विस्तृत रेत !!
महा जल राशि !!!
सच वही हूँ मैं,
जिसे तुम ,
जानने की त्वरा में,
भूल बैठे, - छोड़ बैठे,
मैं वही हूँ ---
मोतियों कि कान्ति वाली ,
झिलमिलाती
एक नन्ही ---
बूँद .
(पुरुषोत्तम )
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