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Saturday, 15 November 2014


मै वही हूँ :--


श्वेत श्रंगों वाला,
 वक्ष को चीर कर ,
फूट पड़ती , -
असंख्य अमृत ~~
 जल धाराएँ.,

मै विस्तृत रेत हूँ,
गोद की परतें खोल कर ,
 गहरे अतल में,
 सिमटकर उभर आती हैं,
 अंजलि भर~~
अमृत की बूँदें .

मैं महाजल राशि हूं,
जलधि ही, थक कर तुम कहीं,
लौट मत जाना !
तुम्हारे लिए ही बंध  गया हूँ,
मौन उन्नत पर्वतों से,
अलस, उज्जवल रेत से,
विरूप शिलाखंडों  से .
लो अभ्रभेदी लहर~~~
तुम तक आ गयी-----

मै वही हूँ बूँद,
जो पर्वतों का वक्ष चीरती है,
जो रेत में सोयी पडी है,
या,
जलधि के वक्ष पर,
 हीरक हार बनती है ,

 बस, वही हूँ मैं--
 नहीं हूँ मै पर्वत !,
विस्तृत रेत !!
महा जल राशि !!!

 सच वही हूँ मैं,
 जिसे तुम ,
जानने की त्वरा में,
 भूल बैठे, - छोड़ बैठे,
मैं वही हूँ ---
मोतियों कि कान्ति वाली ,
झिलमिलाती 
 एक नन्ही ---
बूँद .

(पुरुषोत्तम )

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