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Saturday, 15 November 2014


भोपाल   त्रासदी --- दो चुटकियाँ :-

एक -

पिताजी ,
तुम त्रासदी में सिमटे और चले गए ,
पर,मैं  
  , तुम्हारा नाम लेने के लिए जिंदा हूँ,
परन्तु ,
सोचता हूँ-- कब तक रहूँगा ?
मुआवज़े के मिलने     तक ?
या-
असावधान तंत्र से  ,
 
त्रासदी के दोहराने तक ?
{
पी.डी. बाजपेयी ...रीवा -- २२/०३/१९८५ }

दो --
पत्नी
 
को त्रासदी ने , दम  ख़म से खरीदा ,
आसान सा सौदा था , शबनम सा खरीदा,
कीमत  , न अब तलक मिली, मुआवज़े के रूप में ,
लगता है , बड़ा सौदा था , हर माल खरीदा. 
{
पी.डी. बाजपेयी ...रीवा -- १७/०८/१९८५}



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