भोपाल त्रासदी --- दो चुटकियाँ :-
एक -
पिताजी ,
तुम त्रासदी में सिमटे और चले गए ,
पर,मैं , तुम्हारा नाम लेने के लिए जिंदा हूँ,
परन्तु ,
सोचता हूँ-- कब तक रहूँगा ?
मुआवज़े के मिलने तक ?
या-
असावधान तंत्र से ,
त्रासदी के दोहराने तक ?
{ पी.डी. बाजपेयी ...रीवा -- २२/०३/१९८५ }
दो --
पत्नी
को त्रासदी ने , दम ख़म से खरीदा ,
आसान सा सौदा था , शबनम सा खरीदा,
कीमत , न अब तलक मिली, मुआवज़े के रूप में ,
लगता है , बड़ा सौदा था , हर माल खरीदा.
{ पी.डी. बाजपेयी ...रीवा -- १७/०८/१९८५}
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