My Pages

Saturday, 15 November 2014



आँख ने रोका बहुत कल रात भर,
पर सुबह होते, न होते, आंसुवों की बन गई लम्बी डगर.
आंसुओं का, गाँव था , औ’ न कोई धाम था,
यूं कहें, इस हाल में, उनका न कोई काम था,
 पर,  कहीं से याद की खुशबु उडी, ,
आँख तक आते, न आते, बन  गयी मोहक अतर.
……..आँख ने रोका बहुत कल रात भर,

 प्यार की टूटी पड़ी शहनायियों से,
 क्यों भला, कोशिश करूँ, औ’ सुरीली तान छेडूँ ?
 आज इस बरसात की, भूरी घटा की ,
शंख ध्वनि से, क्यों मै उसकी राह मोडूं ?
 क्यूँ करूं मै आंसुवों से बैर इतना ?
ये ही मेरे आज के है मौन स्वर !!!
……..आँख ने रोका बहुत कल रात भर,

०२/०२/१९८२.


उत्तराखंड त्रासदी पर विशेस :-

शिव जी, क्षमा करें !!!
बड़ा सवाल है आपसे !!!!!!!!

पर्वत-पर्वत बिखर गए है, हे शिव!, तुमने ये क्या कर डाला.
भक्त तुम्हारे, तड़प गए है, क्यों चाहा मुंडों की माला ?

प्रलय भेज दी, निज भक्तों पर, और तांडव ही कर डाला  !!!
ऐसा क्या अपराध हुवा था, म्रत्यु की पहना दी, वरमाला !!

सब बिछुड़े अपनों से, हे प्रभु ! क्यों कर रौद्र रूप धर डाला ?
गंगा-चन्द्र शिरोधारी हो, फिर क्यूँ सर्प दंश कर डाला ?

हे कैलाश पति! तुमने तो, क्यों भक्तों में भय भर डाला ?
अपनों से बिछड़े, भक्तों को, दु:ख अवसाद कष्ट में डाला .

भूलो अब अपने भक्तों को, नहीं चढ़ाएंगे वे अब माला !!

पुरुषोत्तम बाजपेयी
२४/०६/२०१३........

No comments:

Post a Comment