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आँख ने रोका बहुत
कल रात भर,
पर सुबह होते, न
होते, आंसुवों की बन गई लम्बी डगर.
आंसुओं का, गाँव
था , औ’ न कोई धाम था,
यूं कहें, इस हाल
में, उनका न कोई काम था,
पर, कहीं से याद की खुशबु उडी,
,
आँख तक आते, न
आते, बन गयी मोहक अतर.
……..आँख ने रोका बहुत कल रात भर,
प्यार की टूटी पड़ी शहनायियों से,
क्यों भला, कोशिश करूँ, औ’ सुरीली तान छेडूँ ?
आज इस बरसात की, भूरी घटा की ,
शंख ध्वनि से,
क्यों मै उसकी राह मोडूं ?
क्यूँ करूं मै आंसुवों से बैर इतना ?
ये ही मेरे आज के
है मौन स्वर !!!
……..आँख ने रोका बहुत कल रात भर,
०२/०२/१९८२.
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Saturday, 15 November 2014
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