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Saturday, 15 November 2014



मुस्कराती आप है,
गुलशन महक उठता है क्यूँ ?
उठाती आप हैं चिलमन,
दिल ये मचल उठता है, क्यूँ ?
ज़हन में आज मेरे है,
सवालों का बड़ा अम्बार, देखो,
किजब तू खिलखिलाती है,
तो लगता,चाँद उग आयाहै, क्यूँ ?

तेरी मुस्कान ने जालिम,
मुझे दीवाना बनाया है,
तेरी नज़रों ने आखिरकार में,
आशिक बनाया है.
बड़ी शिद्दत से, हरदम,
नाम, लेता हूँ, तुम्हारा मै,
लज्जत-ए-हमसायगी के ख्वाब का,
अहसास आया है

तेरी मुस्कान मेरी है,
गैरों की हो नहीं सकती,
जो थिरकन, है लबों की, आपके,
वो मेरे लिए ही चलती,
कोई आहट, अगर आये,
तो क़दमों की तेरे आये,
किसी भी गैर के खातिर,
कभी भी हो नहीं सकती .

पुरुषोत्तम बाजपेयी
२४/०६/२०१३.........प्रातः  ४.३०

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