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Wednesday, 19 November 2014



सावन का एक विरह गीत ::-

कोई धीरज हमें बंधाये, नहीं पिया जो आये !!
सूना पन, अंधियारे जैसा, उजियारा क्यूँ आये!! ........कोई धीरज हमें दिलाये ...

सावन भी, अब द्वार आ गया, हरदम हमें सताए,
सह न सकूंगी, अगन, और अब, सावन हमें जलाए,
सावन कितना ,निर्दय है जो, गम में सदा डुबाये, .....कोई धीरज हमें दिलाये ...

सावन की अंधियारी रातें, जुगुनू भी मुस्काये,
टपटप करती बूंदे तन पर, सिहरन सी हो जाए,
जुगुनू जब चमके, तो, जलते, दिल को और जलाए, .....कोई धीरज हमें दिलाये ...

सावन आया, तुम ना आये, लगा एक युग बीता,
याद तुम्हारी हर पल आई, पर मन रीता रीता,
सावन की बूंदा - बांदी में, मन चंचल भरमाये, .....कोई धीरज हमें दिलाये ...

यादें, तनहा, बाट जोहती, बिरहन बनी कुंवारी,
प्रेम-रोग ये कैसा पापी, भूख-प्यास सब वारी,
तुम संग अठखेली की चाहत, कैसी सिहरन लाये...... कोई धीरज हमें दिलाये ...

सखियों की, अंखियों में सावन, बाहों में साजन है,
मन, उमंग, से नृत्य कर रहा, जैसे वृन्दावन है,
कृष्ण मुरारी ! सुनो, याचना, जल्दी, पी घर आये, ...... कोई धीरज हमें दिलाये ...


....१२/०७/२०१३

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