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Saturday, 15 November 2014

आधुनिक कुंडलियां :-

१::- सी.बी.आई., देखिये, आज हो रही मुक्त,
अभिशप्ती थी अब तलक, जैसे हो अभियुक्त.
जैसे हो अभियुक्त, मगर वो दाना पाए,
आकाओं’’ से नित्य, लौट पिंजरे में जाए,
भूखादेखे आज, आँख में धुल झोकाई,
इशरत का फिर केस ,खोलती सी.बी.आई.

२::-इशरत-इशरतहै हुआ, आज कांग्रेस-मन्त्र,
सारा कुनबा जुट गया, सी. बी. आई. तंत्र.
सीबीआई तंत्र, जो सच पर आँखे भींचे,
सरकारी इक्षाओं पर, ही खुद को सींचे,
भूखादेखे, चौदह के चुनाव की कसरत,
तनमनधन केसंग, जपे वो इशरत-इशरत.

३::-बड़े सबूतों के लिए , कर ली आँखे बंद,
फिर भी जनता दे रही, अपनी राय पसन्द .
अपनी राय पसन्द, न्याय की उड़ती धज्जी,
आतंकी को, मिलती रहती, पूडी सब्जी.
भूखा दर्पण साथमें रखता, कलम कान में खोंस,
नकली तथ्यों से बनते है, सभी मामले ठोस.

.... पुरुषोत्तम बाजपेयी ० ५/०७/२०१३ . प्रातः. ३.३०













संग तुम्हारे :-

संग तुम्हारे, रीते मन में, कुछ तो हलचल आई है,
सावन भादौं की वर्षा में, तू फुहार सी लाई है.

खाली था आकाश, सिन्धु जल, निश्छल सा था,
पवन बिलखती, विचरण करती, मन में, जैसे छल सा था ,
बदल रहा है, सब कुछ मेरा, आँख भी अब शरमाई है,.
.........................
सावन भादौं की वर्षा में, तू फुहार सी लाई है.

रंगों के पर्वों जैसी तू, दीप पंक्ति, आनंदी है,
झरझर करती, जल प्रपात-सी, मंद समीर सुगंधी है,.
पुरवैया भी सर - सर करती, जब से तू इठलाई है,
............................
सावन भादौं की वर्षा में, तू फुहार सी लाई है.

फूलों की तू, एक वाटिका, सागर की इक, लहर है तू,
यमुनातट का, एक किनारा, और भोर की, प्रहर है तू,
जब से उतरी, तू है मन में, कलम मेरी मुस्काई है,
...........................
सावन भादौं की वर्षा में, तू फुहार सी लाई है.

पूजा की थाली, मेरी तू, धुप दीप औहार है तू,
प्रेम तरंगों सी, सिहरन तू, स्वांसों का आधार है तू,
अन्जाने में ही, तू मन में, कैसे आज समाई है,
..............................
सावनभादौं की वर्षा में, तू फुहार सी लाई है.

पुरुषोत्तम बाजपेयी ....( १७/०७/२०१३....प्रातः ५.३० )

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