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Wednesday, 19 November 2014

उसकी बड़ी नाराजी है:-

उसने रोका, रुक ना पाई, ये ही बड़ी नाराजी है,
सीमाओं को लांघ न पाई, उसकी बड़ी नाराजी है.


जिस समाज में, मर्यादाओं का, ही होता हो मोल, वहाँ ,
उसे अंगूठा दिखा न पाई, ये ही बस नाराजी है.


सच है, मेरे मन में, उठती रहती प्रेम तरंगे, प्रतिपल,
पर मन ही मन, दबा गई मै, ये उसकी नाराजी है.


बहुत कहा, तू देवदास का, रूप निरख ले अपना अब,
मै भी, मीरा बन ना पायी, ये उसकी नाराजी है.


प्रेम में होती “अणु की शक्ति”, ये सबको मालूम ही है,
उस शक्ति को चला न पाई, ये उसकी नाराजी है.


अब तक, वह रूठा है मुझसे, हम शीरी-फरहाद नहीं,
लिकिन, वह क्यों नहीं समझता, ये “मेरी” नाराजी है ?


पुरुषोत्तम बाजपेयी,
(आज, २०/०९/२०१४ प्रातः. ४ बजे)

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