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Thursday, 20 November 2014



मेरे सभी सहोदर हैं :-

जीवन की आपाधापी में, गुजरे सालों साल हमारे,
फिर भी मन विश्वास कर रहा, सक्षम है ये हाथ हमारे .

कठिन डगर से, चलकर आई, फिरभी है आराम नहीं,
जो भी देखा, जाना, भोगा, डगर कभी आसांन  नहीं.
  
दो रोटी है बड़ी पहेली, जीवन भर सुलझा न सकी,
अठखेली, स्वच्छंद हंसी को, जीवन भर अपना न सकी.

कोमलता हांथोकी खोकर, शुष्क हो चुकी हैं आँखें,
उड़ने को जीवन भर चाहा, पर  टूटी थी हर पांखें.

ईश्वर पर विश्वास बहुत है, आज भी देता है रोटी,
श्रम ही पथ है, लक्ष्य यही है, बात नहीं ये छोटी.

बड़ा भाग्य है मेरा अपना, मेरे सभी सहोदर हैं,
सबकी हूँ मै, मेरे सब हैं, बस, संबंध धरोहर हैं . 

पुरुषोत्तम बाजपेयी ....२०/०८/२०१४.....रात्रि १० बजे.


Wednesday, 19 November 2014

उसकी बड़ी नाराजी है:-

उसने रोका, रुक ना पाई, ये ही बड़ी नाराजी है,
सीमाओं को लांघ न पाई, उसकी बड़ी नाराजी है.


जिस समाज में, मर्यादाओं का, ही होता हो मोल, वहाँ ,
उसे अंगूठा दिखा न पाई, ये ही बस नाराजी है.


सच है, मेरे मन में, उठती रहती प्रेम तरंगे, प्रतिपल,
पर मन ही मन, दबा गई मै, ये उसकी नाराजी है.


बहुत कहा, तू देवदास का, रूप निरख ले अपना अब,
मै भी, मीरा बन ना पायी, ये उसकी नाराजी है.


प्रेम में होती “अणु की शक्ति”, ये सबको मालूम ही है,
उस शक्ति को चला न पाई, ये उसकी नाराजी है.


अब तक, वह रूठा है मुझसे, हम शीरी-फरहाद नहीं,
लिकिन, वह क्यों नहीं समझता, ये “मेरी” नाराजी है ?


पुरुषोत्तम बाजपेयी,
(आज, २०/०९/२०१४ प्रातः. ४ बजे)

बिगुल बजाता है::-

अब मिटने का समय तुम्हारा, पास में आता है,
करवट सबकी बदल गई है, समय बताता है.

युवा जगा ही देश के खातिर,
मिट जाएगा देश के खातिर.
मगर मिटाने तुमको !! पहले, शंख बजाता है ...
करवट सबकी बदल गई है, समय बताता है.

कितने अत्याचार कर चुके  !!
कितने तुम अपराध कर चुके !!
लेखाजोखा हाथमें लेकर, अबतो बिगुल बजाता है,
करवट सबकी बदल गई है, समय बताता है.

भ्रष्टाचार बसा है रग में.
पाप कर्म के हो तुम बस में.
गांधी के सपने को कैसे, घात दिखाता है !!!
करवट सबकी बदल गई है, समय बताता है.
स्वच्छ प्रशासन ध्वस्त हो गया,
जीवन सरल, निरस्त हो गया

खून के आंसू आज निकलते, तू अक्रान्ता है;
करवट सबकी बदल गई है, समय बताता है’

पाकिस्तान दबंगी करता,
तू शामे ..   नारंगी करता,
भगत सिंह रोता है, औ’ आज़ाद बिलखता है,
करवट सबकी बदल गई है, समय बताता है.

पुरुषोत्तम बाजपेयी
(०७/०८/२०१३ शाम ४.०० बजे)







जूलाई २००६ में , मुंबई में बम धमाकों ने  पूरे राष्ट्र को हिला के रख दिया था. उसी दौरान लिखी कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत है .

शहर बन गए गाँव अब, विद्युत् चमके रोज़.
गुड रोटी को छोड़ कर, सामिष का  है भोज.

चूक चौकसी में रही, खुली व्यवस्था पोल,
चीखे सुनना, बंद कर, बजा शांति के ढोल.

मुंबईकर की धड़कने, चलती लोकल बीच,
बम-विस्फोटों ने दिए, तन से प्राण उलीच.

मृतकों को रूपये मिले, घर की चैन बिसार,
डब्ल्यू. टी. ओ. के तईं, मुक्त किया व्यापार.

सभ्य - असभ्यों में हुई, कैसी खूनी दौड़,
मेहनत–कश इस शहरको, नज़र लगी बेजोड़.

हर चैनल पर आज है, बम, घायल और खून,
पीड़ा का वर्चस्व है, अन्तर मन है सून.

पुरुषोत्तम बाजपेयी ........१३/०७/२००६