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Sunday, 16 November 2014



भारतीय राजनीति में , २०१४ के चुनाव के बाद भरी बदलाव, और, उज्जवल भविष्य की गारंटी !!


हर समाज में बदलाव का दौर आता ही रहता है.स्वाभाविक   है.चाहे  भारत हो या   रूस, अमरीका, . किन्तु प्रश्न ये है की उस बदलाव को समाज कैसे स्वीकार करता है.कुछ लोगकाफी अच्छी तरह से विरोध कर सकने की क्षमता  रखते है,लेकिन उनसे स्थिति को सूधारने को कहा जाये तो , वे लोग बगले झांकने लगते है.ऐसे लोग किसी चित्र को गलतिया बताने के लिए ब्रश चला कर ख़राब तो कर सकते है , पर उसे सुधार कर सुन्दर नहीं बना सकते. . पुराने  राजनीतिक विचारक प्लूटो  के सिद्धांत - थीसिस, एंटी- थीसिस, सिन्थिसिस, और  फिर वापस थीसिस को याद करना चाहिए कि समाज  में  प्रति पल,अनंत काल से बदलाव चल रहा है, जो तुरंत नहीं दिखाई देता, १००-५० वर्षों के बाद तुलनात्मक रूप से देखने पर मालूम होता है. तभी लोग ये कहते पाए जाते है कि "' ओह क्या  ज़माना आ गया "' इस लिए नरेन्द्र मोदी अपनी जगह ठीक, मनमोहन अपनी जगह ठीक.


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