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Thursday, 20 November 2014



मेरे सभी सहोदर हैं :-

जीवन की आपाधापी में, गुजरे सालों साल हमारे,
फिर भी मन विश्वास कर रहा, सक्षम है ये हाथ हमारे .

कठिन डगर से, चलकर आई, फिरभी है आराम नहीं,
जो भी देखा, जाना, भोगा, डगर कभी आसांन  नहीं.
  
दो रोटी है बड़ी पहेली, जीवन भर सुलझा न सकी,
अठखेली, स्वच्छंद हंसी को, जीवन भर अपना न सकी.

कोमलता हांथोकी खोकर, शुष्क हो चुकी हैं आँखें,
उड़ने को जीवन भर चाहा, पर  टूटी थी हर पांखें.

ईश्वर पर विश्वास बहुत है, आज भी देता है रोटी,
श्रम ही पथ है, लक्ष्य यही है, बात नहीं ये छोटी.

बड़ा भाग्य है मेरा अपना, मेरे सभी सहोदर हैं,
सबकी हूँ मै, मेरे सब हैं, बस, संबंध धरोहर हैं . 

पुरुषोत्तम बाजपेयी ....२०/०८/२०१४.....रात्रि १० बजे.


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