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Wednesday, 19 November 2014



जूलाई २००६ में , मुंबई में बम धमाकों ने  पूरे राष्ट्र को हिला के रख दिया था. उसी दौरान लिखी कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत है .

शहर बन गए गाँव अब, विद्युत् चमके रोज़.
गुड रोटी को छोड़ कर, सामिष का  है भोज.

चूक चौकसी में रही, खुली व्यवस्था पोल,
चीखे सुनना, बंद कर, बजा शांति के ढोल.

मुंबईकर की धड़कने, चलती लोकल बीच,
बम-विस्फोटों ने दिए, तन से प्राण उलीच.

मृतकों को रूपये मिले, घर की चैन बिसार,
डब्ल्यू. टी. ओ. के तईं, मुक्त किया व्यापार.

सभ्य - असभ्यों में हुई, कैसी खूनी दौड़,
मेहनत–कश इस शहरको, नज़र लगी बेजोड़.

हर चैनल पर आज है, बम, घायल और खून,
पीड़ा का वर्चस्व है, अन्तर मन है सून.

पुरुषोत्तम बाजपेयी ........१३/०७/२००६

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