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Sunday, 16 November 2014



दीप लिए चलता हूँ....

अनगित गीतों के मुखड़ो को साथ लिए चलता हूँ,


जलते दीपक की लव के संग, रात लिए  चलता हूँ.  
गीत हमारे राह दिखाते है इस जगको पल-प्रतिपल,


 सत्य प्रेम के धवल मुकुट का तेज़ लिए चलता  हूँ.  
जीवन तो है एक विसंगति, गति पाने को व्याकुल लोग,


धर्मगुरु बन, मठाधीश बन, मोक्ष द्वार ले चलता हूँ.  
कलुषित शाशक, लघु-जन नायक,पर अंतर्मन से खलनायक,


भिक्षा पात्र लिए जनजन की आस लिए चलता हूँ  
सन्यासी मन, चेतन चिंतन, राष्ट्र समर्पित तन-मन-धन,
 
धुप अंधियारों के जंगल में, दीप लिए चलता हूँ.
 


.............................पुरुषोत्तम   बाजपेयी.......मुंबई २०/०९/२०११

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