श्वांस क्रिया को जानिये !!
जब हम श्वांस अन्दर लेते है, तो वह स्वर यन्त्र और ग्रसनी (फैरिंग्स ) से होते जी ट्रैकिया श्वांस नली में जाती है, सीने में, यह , दायें - बांये दो भागों में फैले, उलटे पेडनुमा नालिकयों में जाकर , तमाम और भी बारीक नलिकाओं में प्रवेश करती है. हमारी एक श्वांस , कारीब २०-२१ स्थानों में विभाजित होती है , जो अंततः एयर बेसिकल ( वायुकोषों ) में खुलती है, जोप छोटे -२ गुब्बारों की भांति होते हैं. यहाँ तक लेन वाली नलिकाओं के साथ रक्त वही नलिकाएं भी होती है, व कोशो के फूलने और पिचकने से, उनको घेर कर रखने वाली बारीक रक्त नलिकाओं, के बीच जो अत्यंत बारीक पर्दा होता हेई, उसके कारण म ओक्सिज़न ग्रहण और कार्बन डाई ओक्साइड छोड़ने की क्रिया आनन् - फानन संभव में हो जाती है
जब हम श्वांस लेते हैं, तो ये सभी नलिकाएं, वायु कोष फेफड़े फूलते है, पसलियाँ , थोड़ी ही सही, लेकिन बढ़ जाती है. मांसपेशिय भी बढ जाती है .इस फैलाव के कारण डायफ्राम पर दबाव आता है और कुछ नीचे झुक जाता है.साधारण श्वांस , जो करीब ५०० मिली लीटर मात्र में होती है,, इस ड़ाय फ्र्रामको मात्र ६०-७०% ही नीचे खिसकाता है ( करीब १ से १.२५से.मी. ) . श्वांस छोड़ने के साथ सभी कुछ सामान्य हो जाता है. ये क्रिया पत्येक श्वांस के साथ होती है.
साधारण श्वांस से २५-३०% ही फेफड़ों में सक्रियता आती है. फलस्वरूप , रक्त संचार की भी मात्रा उतनी ही होती है/. व्यायाम करने से, सीढिया चढ़ने से, कम सक्रीय वायुकोशो , व फेफड़ों पर जोर पड़ता है - हम हाफ्ने लगते है. ,
प्राणायाम करने से डायफ्राम पर २५श्र ३० % तक अधिक दबाव पड़ता है , फलस्वरूप मांस पेशियाँ भी सक्रिय हो जाती है. - फेफड़े अधिक वायु प्राप्त कर , फूलते है, रक्त संचार में अधिक सक्रियता आ जाती है. ह्रदय पर अधिक सक्रिय होने को प्रोत्साहित करती है. अधिक श्वांस को ग्रहण करना अधिक ओक्सिज़न का प्राप्त होना , ह्रदय के लिए सुनिश्चित हो ने लगता है.
ह्रदय को,
मांस पेशियों को, फेफड़ों को
,रक्त संचार करने वाली
नलिकाओं को, अधिक कार्य करने की
क्षमता पर , एवं उनगे साधारण मात्रा में
श्वांसें प्रदान करके
उन्हें काहिल बनाये रखते है,
जो घातक तो है ही , लम्बी उम्र की दुश्मन
भी है. इन सब को " उपवास " ना करने दे. गहरी श्वांसें ले ले कर , अन्दर के सभी अंगो को
भरपूर ओक्सिज़न देते रहें.. अधिक
गहरी श्वांसें लेते रहने से ,क डाई फ्राम , लीवर , अग्नाशय, आंतडिया , अद्रिनल ग्लांड्स,
गुरदे,
पैन्क्र्याज़ , किडनी, मलाशय, गर्भाशय (महिलाओं के
मामले में ), आदि पर डायफ्राम
के द्वारा , प्राप्त दबाव से , इन सब में मालिश , व व्यायाम हो जाने के
कारण ये सब अधिक सक्षम , सक्रिय और क्रियाशील हो जाते हैं.क्यों की हर
श्वांस के साथ इन सबको , न केवल अधिक ओक्सिज़न मिल रहा है , वरन , उसके साथ व्यायाम भी
होने लगता है. नतीजा "
मज़ा ही मज़ा " क्यों
की उनको पर्याप्त भोजन, अर्थात प्राणवायु मिलने
से रोग- अवरोधक शक्ति बढ़ जाती है.
नया रक्त बनना बढ़ जाता है
" इसबगोल " खाने की आवश्यकता
नहीं होती है. अंतड़ियों में , जमा पुराना मल
आगे खिसक जाता है और
बिना प्रयास के, शीघ्र निकल जाता है . इन सबका सीधा असर आपके विवेक पर पड़ता है--
धैर्य, समझदारी बढ़ जाती है,
काम - क्रोध - लोभ संकुचित हो जाते है , व्यक्ति निरोगी हो जाता है प्रसन्नता की
स्थिति विकासित हो जाती है.
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