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Sunday, 16 November 2014




 
श्वांस क्रिया को जानिये !!

जब हम श्वांस अन्दर लेते है, तो वह स्वर यन्त्र और ग्रसनी (फैरिंग्स ) से होते जी ट्रैकिया  श्वांस नली में जाती है, सीने में, यह , दायें - बांये दो भागों में फैले, उलटे पेडनुमा नालिकयों  में जाकर , तमाम और भी  बारीक नलिकाओं में प्रवेश करती है. हमारी एक श्वांस , कारीब २०-२१ स्थानों में  विभाजित होती है , जो अंततः एयर बेसिकल ( वायुकोषों ) में खुलती है, जोप छोटे -२ गुब्बारों की भांति होते हैं. यहाँ तक लेन वाली नलिकाओं के साथ रक्त वही नलिकाएं भी होती है, व कोशो के फूलने और पिचकने से, उनको घेर कर रखने वाली बारीक रक्त नलिकाओं, के बीच जो अत्यंत बारीक पर्दा होता हेई, उसके कारण म ओक्सिज़न ग्रहण और कार्बन डाई ओक्साइड  छोड़ने की क्रिया आनन् - फानन संभव  में हो जाती है

जब हम श्वांस लेते हैं, तो ये सभी नलिकाएं, वायु कोष फेफड़े फूलते है, पसलियाँ , थोड़ी ही सही, लेकिन बढ़ जाती है. मांसपेशिय  भी बढ जाती है .इस फैलाव के कारण डायफ्राम पर दबाव आता है और कुछ नीचे झुक जाता है.साधारण श्वांस , जो करीब ५०० मिली लीटर मात्र में होती है,, इस ड़ाय फ्र्रामको मात्र ६०-७०% ही नीचे खिसकाता है ( करीब १ से १.२५से.मी. ) . श्वांस छोड़ने के साथ सभी कुछ सामान्य हो जाता है. ये क्रिया पत्येक श्वांस के साथ होती है.
साधारण श्वांस से २५-३०% ही फेफड़ों में सक्रियता आती है. फलस्वरूप , रक्त संचार की भी  मात्रा उतनी ही  होती है/.  व्यायाम करने  से, सीढिया चढ़ने से, कम सक्रीय वायुकोशो , व फेफड़ों पर जोर पड़ता है  - हम हाफ्ने लगते  है. ,
प्राणायाम करने से डायफ्राम पर २५श्र ३० % तक अधिक दबाव पड़ता है  , फलस्वरूप मांस पेशियाँ भी सक्रिय हो जाती है. - फेफड़े अधिक वायु प्राप्त कर , फूलते है, रक्त संचार में  अधिक सक्रियता  आ जाती है. ह्रदय पर अधिक सक्रिय होने को प्रोत्साहित करती है. अधिक श्वांस को ग्रहण करना अधिक ओक्सिज़न का प्राप्त होना , ह्रदय के लिए सुनिश्चित   हो ने लगता है.
ह्रदय को, मांस पेशियों को, फेफड़ों  को ,रक्त संचार करने वाली नलिकाओं को, अधिक कार्य करने की क्षमता पर , एवं  उनगे साधारण मात्रा में श्वांसें   प्रदान  करके उन्हें  काहिल बनाये रखते है, जो घातक तो है ही , लम्बी उम्र की  दुश्मन भी है. इन सब को " उपवास " ना करने दे. गहरी श्वांसें ले ले कर , अन्दर के सभी अंगो को भरपूर ओक्सिज़न देते रहें.. अधिक गहरी श्वांसें लेते रहने से ,क डाई फ्राम , लीवर , अग्नाशय, आंतडिया  , अद्रिनल ग्लांड्स, गुरदे, पैन्क्र्याज़ , किडनी, मलाशय, गर्भाशय (महिलाओं के मामले में ), आदि पर डायफ्राम  के द्वारा , प्राप्त दबाव से , इन सब में मालिश , व व्यायाम हो जाने के कारण ये सब अधिक सक्षम , सक्रिय और क्रियाशील हो जाते हैं.क्यों की  हर श्वांस के साथ इन सबको , न केवल अधिक ओक्सिज़न मिल रहा है , वरन , उसके साथ व्यायाम भी होने लगता है. नतीजा "  मज़ा ही मज़ा "  क्यों की उनको पर्याप्त भोजन, अर्थात प्राणवायु मिलने  से रोग- अवरोधक शक्ति बढ़ जाती है. नया रक्त बनना बढ़ जाता है    "  इसबगोल " खाने की आवश्यकता नहीं होती है. अंतड़ियों में , जमा पुराना मल  आगे खिसक जाता है  और बिना प्रयास के, शीघ्र  निकल जाता है . इन सबका सीधा असर आपके विवेक पर पड़ता है-- धैर्य, समझदारी बढ़ जाती है, काम - क्रोध - लोभ संकुचित हो जाते है , व्यक्ति निरोगी हो जाता है प्रसन्नता  की स्थिति विकासित हो जाती है.

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